कैसे बढ़ाएं मानसिक स्वास्थ्य

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हम सभी जानते हैं कि अपने शरीर को स्वस्थ्य रखना कितना आवश्यक है. अखबारों, होर्डिंग्स और टेलीविज़न पे हम प्रतिदिन न जाने कितने विज्ञापन देखते हैं जो हमें च्यवनप्राश, शहद, हेल्थ ड्रिंक्स, इत्यादि के लिए प्रेरित करते हैं. हमारे पसंदीदा फ़िल्मी सितारे भी “६ पैक ऐब्स” और “साइज ०” की बात करते हैं. इस सब में मानसिक स्वस्थ्य का कहीं कोई ज़िक्र नहीं होता. बल्कि मानसिक परेशानियों का होना या उनके बारे में बात करना अनुपयुक्त समझा जाता है. जहां शरीर की तकलीफों को देखा और नापा जा सकता है, मानसिक तकलीफों को केवल महसूस किया जा सकता है. यही सब कारण है कि हम अपने मानसिक स्वस्थ्य का उतना ध्यान नहीं रखते जितना हमें रखना चाहिए.

मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ है हमारी मानसिक और भावनात्मक तंदरुस्ती. यह हमारे सोचने, महसूस करने के तरीके और व्यवहार पर असर डालती है. तनाव झेलने की हमारी क्षमता, किसी मुश्किल से निकल पाने की हिम्मत और दूसरों से मधुर रिश्ते बनाये रख पाना हमारे मानसिक स्वस्थ्य पर ही निर्भर करता है. जीवन के हर पड़ाव पे ये स्वास्थय महत्त्वपूर्ण है, चाहे वो बचपन हो या बुढ़ापा. यदि व्यक्ति मानिसक रूप से स्वस्थ्य हो तो वो:

  • ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव का दृढ़ता से सामना कर सकता है.
  • अपने कार्य को उपयोगिता से कर सकता है.
  • समाज में एक सार्थक योगदान दे सकता है.
  • *अपने पूर्ण सामर्थ्य को प्राप्त कर सकता है.

अपने मानसिक स्वस्थ्य को बढ़ाने के लिए कई उपाय हैं. इन सरल तरीकों के अनुसरण में न ही ज़्यादा पैसा खर्च होगा और न वक़्त.

१. भोजन और व्यायाम का रखें ध्यान.

सही वक़्त पे और संतुलित आहार लेना हमारे शारीरिक ही नहीं मानसिक स्वाथ्य के लिए भी ज़रूरी है. मोटापे से अक्सर व्यक्ति का आत्म विश्वास आहत होता है जो आगे चलकर अवसाद का कारण भी बन सकता है. वज़न को कायम रखने और चुस्ती फुर्ती बनाये रखने के लिए नियमित व्यायाम भी ज़रूरी है. व्यायाम करने पर हमारा शरीर एंडोर्फिन नामक एक रासायनिक तत्व की उत्पत्ति करता है. एंडोर्फिन को “हैप्पी हॉर्मोन” भी कहा गया है क्यूंकि ये हमारे मन को खुशगवार बनाये रखने में सहायक होता है. एक शोध के अनुसार उचित आहार और नियमित व्यायाम हमारी मानसिक क्षमता और आयु को बढ़ाते है. इसलिए मानसिक स्वास्थय कि शुरुआत शारीरिक स्वास्थ्य से ही करनी होगी.

. विश्राम को भी दें महत्व.

हम रोज़ अपने शरीर को अनेक तरीकों से थकाते हैं. यहां तक की मानसिक परिश्रम भी शरीर और मन दोनों में तनाव पैदा करता है. ऐसे में शरीर और मन को उपयुक्त विश्राम देना ज़रूरी है. रोज़ ६ से ८ घंटे की नींद लेना आवश्यक है. अगर संभव हो तो दोपहर में भी आधा-पौन घंटे की नींद लें. इससे हमारे शरीर और मन दोनों की सेहत पे सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा योग और ध्यान के अनुसरण से भी हम शरीर को आराम दे सकते हैं. आप भले ही इसके लिए प्रतिदिन केवल १५ मिनट निकालें, पर ऐसा करने पे आप तारो ताज़ा हो जाएंगे और अपने रोज़ की चुनौतियों के लिए तैयार महसूस करेंगे.

. अपनों के साथ बिताएं वक़्त.

हम सभी जीवन के कार्य कलापों में सदेव उलझे रहते हैं. हर दिन इसी दौड़ भाग में निकल जाता है और हम शिकायत ही करते रह जाते हैं कि खुद के लिए वक़्त ही नहीं मिलता. यदि हम इसका महत्व समझें तो अपनी रोज़ की दिनचर्या से कुछ समय खुद के लिए और अपने परिवार के लिए निकालना कोई बड़ी बात नहीं है. रोज़ कुछ वक़्त अपने जीवन साथी के साथ बिताएं. अपने अपने दिन कि चर्चा करें. बच्चों के जीवन में क्या चल रहा है उसे भी जानने की कोशिश करें. ऐसा करने से आप खुद में एक नयी ऊर्जा का संचार महसूस करेंगे.

. डायरी लिखना शुरू करें.

प्रायः हम दूसरों के व्यवहार और स्वभाव का तो बहुत विश्लेषण करते हैं, पर स्वयं के बारे में बहुत काम जानते हैं. ऐसा इसलिए क्यूंकि हम कभी अपनी भावनाओं और प्रतिक्रियाएं के बारे में गंभीरता से नहीं सोचते. इसका नतीजा ये होता है कि हम अपनी कमियों को समझ नहीं पाते और उन्हें बारे बार दोहराते रहते हैं. प्रतिदिन डायरी लिखना एक अच्छी आदत है जो हमें खुद को और जानने में भी सहायता करती है. साथ ही ऐसा करने से हम स्वयं ही अपनी नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित कर सकते हैं. हमारी डायरी स्वयं का ही विस्तार बन जाती है जो अच्छे बुरे वक़्त में हमारा साथ देती है.

. सामाजिक गतिविधियों में लें भाग.

इंसान एक सामाजिक पशु है. हम सभी को जीवन में बहुत से लोगों का साथ चाहिए होता है. ये साथ कभी हमारा मार्गदर्शन करता है तो कभी और बेहतर करने की प्रेरणा देता है. समाज से दूर रहके कोई व्यक्ति कभी सुखी नहीं रहा है. मानसिक स्वास्थ्य पाने के लिए व्यक्ति को अपने समाज में होने वाले अनेक अवसरों में बढ़ चढ़ के हिस्सा लेना चाहिए. फिर चाहे वो जन्मदिन/ विवाह का भोज हो या किसी के दुःख कि घडी. समाज के साथ से ही हमें अपनापन भी मिलता है और सहारा भी.

. नकारात्मकता से बचें.

इंसान की प्रवृत्ति कुछ ऐसी है कि सदेव जो है उसे छोड़के जो नहीं है उसी तरफ ध्यान जाता है. यद्यपि ये स्वाभाविक है फिर भी कुछ हद तक हमें खुद को इस नकारात्मक मानसिकता से बचाना चाहिए. यदि आप इस बात पे ध्यान दें कि आप कितनों से बेहतर हैं तो ग्लास हमेशा आधा भरा नज़र आएगा. आपके साथ कुछ गलत भी हो तो ये याद रखें कि धूप छाँव दोनों जीवन का अभिन्न हिस्सा है और इन में से कुछ भी हमेशा के लिए नहीं ठहरता. आपके जो दोस्त केवल नकारात्मक बात करते हैं, उन्हें भी समझाएं या उनसे दूरी बना लें. जीवन में वैसे ही उलझनें क्या काम हैं जो हम अपने आस पास नकारात्मक ऊर्जा को पनपने दें.

. बुरी आदतों को दें त्याग.

अक्सर लोग तनाव से बचने के लिए सिगरेट, शराब जैसे नशे की लत्त पाल लेते हैं. वह ये मान लेते हैं की ये नशा ही उनकी परेशानियों और ग़मों का इलाज है. जबकि सच तो ये है कि नशे से न सिर्फ हमारी बल्कि हमसे प्यार करने वालों की परेशानियां भी केवल बढ़ती हैं. इन आदतों को जितना जल्दी छोड़ेंगे, उतनी काम मुश्किल होगी. आजकल तो इनके अलावा इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग कि भी लत्त ने अनेक बच्चों और नौजवानों को अपनी गिरफ्त में लिया हुआ है. सच तो ये है कि अति हर चीज़ की बुरी होती है. इसलिए हर कार्य में संतुलन बनाये रखना आवश्यक है.

. अपनी अभिरुचि को उभारें.

हम सभी के अलग अलग शौक होते हैं जो प्रायः उम्र और व्यस्तता के कारण हमसे छूटते जाते हैं. ये शौक हमारे व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण अंग होते हैं जो हमें कभी नहीं गवाना चाहिए. इन्हे अपनाने से न सिर्फ हम खुद के और करीब होते हैं बल्कि अपनी रचनात्मकता को और बढ़ाने में सफल होते हैं. साथ ही हम हमारे जैसी ही रूचि रखने वाले अन्य लोगों से भी मिल सकते हैं. मनोचिकित्सा में ऐसे अनेक शोध हुए हैं जिन्होंने अभिरुचि होने के सकारात्मक प्रभाव पर प्रकाश डाला है.

. अपनों की ले राय.

अक्सर हम अपनी परेशानियों में स्वयं ही घुटते रहते हैं और हमारे आस पास मौजूद लोगों को इसकी भनक तक नहीं होती. कभी शर्मिंदगी तो कभी मदद न मिलने की उम्मीद से हम अपनी तकलीफें खुद तक ही रख लेते हैं. परन्तु सच तो ये है कि कई बार हमारे अपने हमारी सोच से परे हमारी मदद कर देते हैं. इसके अलावा अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने पर ही अक्सर हम बेहतर महसूस करते हैं और उन्हें खुलके कह देने के बाद पहाड़ सी लग रही समस्या भी सामान्य लगने लगती है और उससे झूझने की हिम्मत आ जाती है.

१०. ज़रुरत पड़ने पर मनोचिकित्सक से लें परामर्श.

यदि सभी प्रयत्न करने पर भी आप अपनी परेशानी को दूर करने में असफल रहे हैं तो किसी मनोचिकित्सक से परामर्श लेने से न हिचकिचाएं. मानसिक परेशानियां या रोग एक आम बात हैं. विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने २००१ में एक रिपोर्ट में खुलासा किया था कि हर चार में से एक व्यक्ति अपने जीवन काल में एक बार इन रोगों का शिकार ज़रूर होता है. पर अफ़सोस कि हमारे समाज में मनोरोगों को कलंक माना जाता है और इसीलिए बहुत से ज़रूरतमंद लोग इस मुश्किल में ही अपना जीवन काट देते हैं. परन्तु ये याद रखें कि ये रोग होना आम बात है और इनका उचित उपचार संभव है. इसलिए परेशानी महसूस होने पर, वक़्त न गवांते हुए किसी मनोचिकित्सक को अवश्य दिखाएँ.

यदि इन सभी बातों का नियमित रूप से पालन करें तो अवश्य आप मानसिक रूप से स्वस्थ्य रहेंगे. आखिर अपनी खैरियत अपने हाथ में ही है.

 

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